जड़ें

जड़ों ने जब सवाल किए तो जड़ों को

कहा गया— जातिवादी।

जबकि कुछ विदेशियों के द्वारा गिनवाई गई

जाति व्यवस्था की अच्छाइयाँ।


आगे चलकर इन्हीं विदेशियों ने

चढ़ा दी तर्क और तथ्य की बलि,

इनके द्वारा ही कलियों को बनाया गया— देवदासी

और लूटी गई कलियों की इज्जत

वे कलियाँ जो भारत की जड़ें थीं।


उन्हीं विदेशियों ने एकलव्य का

अंगूठा कटवाकर हमें यह समझाया कि

तीर चलाना जड़ों का काम नहीं है।


जड़ों के पसीने को कहा गया— अछूत

और निठल्ले विदेशी वर्णवादियों ने

स्वयं को कहा— पवित्र


उन्होंने ही ‘पुनर्जन्म’ का डर दिखाया।

जो जड़ें होती थीं बौद्ध सबका,

उन्हें ही नीच और अधम बताया।


विदेशियों के द्वारा ही पूजवाया गया—

बंदर और बैलों जैसे पशुओं को,

विदेशियों के द्वारा ही भारत की

मूल जड़ों को कहा गया— दैत्य, दानव और राक्षस।


मगर विदेशी भूल गए कि ये भारत की जड़ें हैं

इन जड़ों को भारत भूमि समेटे हुए है

अपनी छाती की गहराइयों में

ये जितनी खोदी जाएंगी उतनी निकलती जाएंगी।

क्योंकि — ये भारत की जड़ें हैं।

— संदीप कुमार

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