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Showing posts from April, 2026

जड़ें

जड़ों ने जब सवाल किए तो जड़ों को कहा गया— जातिवादी। जबकि कुछ विदेशियों के द्वारा गिनवाई गई जाति व्यवस्था की अच्छाइयाँ। आगे चलकर इन्हीं विदेशियों ने चढ़ा दी तर्क और तथ्य की बलि, इनके द्वारा ही कलियों को बनाया गया— देवदासी और लूटी गई कलियों की इज्जत वे कलियाँ जो भारत की जड़ें थीं। उन्हीं विदेशियों ने एकलव्य का अंगूठा कटवाकर हमें यह समझाया कि तीर चलाना जड़ों का काम नहीं है। जड़ों के पसीने को कहा गया— अछूत और निठल्ले विदेशी वर्णवादियों ने स्वयं को कहा— पवित्र उन्होंने ही ‘पुनर्जन्म’ का डर दिखाया। जो जड़ें होती थीं बौद्ध सबका, उन्हें ही नीच और अधम बताया। विदेशियों के द्वारा ही पूजवाया गया— बंदर और बैलों जैसे पशुओं को, विदेशियों के द्वारा ही भारत की मूल जड़ों को कहा गया— दैत्य, दानव और राक्षस। मगर विदेशी भूल गए कि ये भारत की जड़ें हैं इन जड़ों को भारत भूमि समेटे हुए है अपनी छाती की गहराइयों में ये जितनी खोदी जाएंगी उतनी निकलती जाएंगी। क्योंकि — ये भारत की जड़ें हैं। — संदीप कुमार

मैं नास्तिक हूँ

मैं नास्तिक हूँ, मेरी भी भावनाएँ आहत होती हैं— जब मैं देखता हूँ, स्वच्छ गंगा में डाली जाती हैं अस्थियाँ और अधजले शरीरों के टुकड़े। मैं नास्तिक हूँ, मेरी भी भावनाएँ आहत होती हैं— जब मैं देखता हूँ, किसी मूर्ख इंसान ने मंदिर बनाकर लगा दिया लाखों की भीड़ को कतार में। मैं नास्तिक हूँ, मेरी भी भावनाएँ आहत होती हैं— जब मैं देखता हूँ, एक बच्चा मंदिर के बाहर भूख से अपनी आंतें चबाता है और ईश्वर भीतर दूध से नहा रहे होते हैं। मैं नास्तिक हूँ, मेरी भी भावनाएँ आहत होती हैं— जब मैं देखता हूँ, गंगा में डुबकी लगाकर 'पाप' धोने का दावा करने वाला घर लौटकर एक इंसान के छूने भर से 'अपवित्र' हो जाता है। मैं नास्तिक हूँ, मेरी भी भावनाएँ आहत होती हैं— जब मैं देखता हूँ, मेरी ही मानव जाति से संबंध रखने वाले लोग पवित्रता के नाम पर खा-पी रहे हैं गोबर और गोमूत्र। मैं नास्तिक हूँ, मेरी भी भावनाएँ आहत होती हैं— जब मैं देखता हूँ, मेरे ही लोगों को ठगा जा रहा है किसी ज्योतिषी के द्वारा भविष्य की गणना करके। मैं नास्तिक हूँ, मेरी भी भावनाएँ आहत होती हैं— जब मैं देखता हूँ, लोग मरने-मारने को तैयार हो जाते हैं...